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जानें कैसे सर्वश्रेष्ठ परभक्षी सिंह बना राजत्व का प्रतीक

4 months ago 102

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पूर्व एशिया के राजा, चाहे वे चीन, जापान, वियतनाम, थाईलैंड या इंडोनेशिया के हों, सिंह को राजत्व का प्रतीक मानते थे। चीन में राजमहलों के सामने, सिंह और सिंहिनी की मूर्तियाँ पाईं जाती हैं। सिंह के पंजे के नीचे एक ग्लोब होता है, जो विश्व का प्रतीक होता है। दूसरी ओर, सिंहिनी के पंजों के नीचे शावक होता है। रोचक बात तो यह है कि पूर्व एशिया में सिंह रहते ही नहीं हैं। वाकई में वे वहाँ कभी नहीं रहें हैं। इसके बावजूद, यह प्राणी पूर्व एशिया की दृश्य संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।

अब सिंगापुर का ही उदाहरण लेते हैं। उसके नाम का अर्थ है वो नगर जहाँ सिंह रहते हैं। लेकिन इस भूमि पर कभी कोई सिंह नहीं रहें हैं। श्री लंका इस देश का प्रतीक भी सिंह है, जो उसके राष्ट्र ध्वज पर मौजूद है। लेकिन वहाँ भी सिंह कभी नहीं रहें हैं। महावंश नामक बौद्ध वृत्तांत के अनुसार, श्री लंका के सिंहल निवासी राजा विजया की संतानें हैं, जो स्वयं भारत से आए थे और जो सिंह की संतान थे। हम इसका यह अर्थ निकाल सकते हैं कि नरसिंह संप्रदाय, जो किसी समय भारत के पूर्वी समुद्रतट पर कलिंग और आंध्र क्षेत्रों में पनपा, वह फैलकर श्री लंका पहुंचा था।

लेकिन क्या उस समय भारत में सिंह रहते थे? कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार गुजरात, मालवा और दक्खन के सूखे जंगलों में वाकई में किसी समय एशियाई सिंह निवास करते थे। और यही कारण है कि भारत में सिंह राजाओं से जुड़ गया और राजाओं का तख़्त सिंहासन कहा जाने लगा। आज भी भारतभर के राजपूत, सिख और अन्य सैन्य समुदाय सिंह और सिंहा जैसे नामों के ज़रिए अपने आप को सिंह के साथ जोड़ते हैं। दुर्गा देवी, जिन्हें राजाओं की देवी माना जाता है, को सिंह पर सवार दिखाया जाता है। सिंह गौतम बुद्ध, जैन तीर्थंकर, महावीर, तथा सम्राट अशोक का भी प्रतीक है। मंदिरों में भी हम ऐसी छवियां पाते हैं जिनमें सिंह गज को वश में कर रहें हैं।

इस प्रकार, चूँकि सिंह हमारी संस्कृति से इतने जुड़ें हैं, इसलिए हम हम मानते हैं कि एशियाई सिंह कभी भारतभर घूमते थे और अब वे केवल गीर के जंगलों में बचें हैं। लेकिन जानवरों के विशेषज्ञ और इतिहासकारों का ठोस विश्वास है कि सिंह भारत के मूल निवासी नहीं हैं। संभवतः, जैसे पूर्वी एशिया में हुआ वैसे भारत में भी राजाओं ने अपनी राजसी सत्ता का प्रदर्शन करने के हेतु से शिकार और चिड़ियाघरों के लिए दूसरे देशों से सिंह लाए।

गुफ़ाओं की पूर्व-ऐतिहासिक कला में सिंह नहीं पाए गए हैं। हड़प्पा के मुहरों पर बाघ और यहाँ तक कि अध-बाघिनी देवियाँ भी पाईं गईं हैं। पर यहाँ भी कोई सिंह नहीं हैं। ऋग्वेद में सिंहों का उल्लेख है। लेकिन ऋग्वेद आर्य लोगों द्वारा रचा गया, जो 3,500 वर्ष पहले हिंदुकुश पर्वत श्रृंखला के उस पार से अश्वों पर सवार होकर भारत आए थे। इस पर्वत श्रृंखला के पश्चिम की ओर सिंहों का आवास था। 2,500 वर्ष पहले, फ़ारसी राजा सिंहो का शिकार करते थे। 4,500 साल पहले, मेसोपोटामिया के वीर सिंहों के साथ कुश्ती लड़ते थे। मिस्र में भी सिंहों की छवियाँ पाईं गईं हैं।

इन सभी कलाकृतियों में, सिंह को वश में करना राजत्व का प्रतीक माना जाता था। मिस्र और मध्य पूर्व एशिया के राजा सिंहों से लड़ते थे जो वहाँ के मूल निवासी थे। चूँकि सिंह पशु जगत का सबसे श्रेष्ठ परभक्षी होता है, इसलिए उसके शिकार के माध्यम से राजा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते थे। यह विचार विश्वभर फैला और सिंह राजाओं का प्रतीक बन गया।

भारतीय लोकसहित्य में, बाघ सबसे महत्त्वपूर्ण बड़ी बिल्ली है और वह कई देवियों और संतों का वाहन है। यह संभव है कि ‘सिंह’ यह शब्द सभी बड़ी बिल्लियों के लिए उपयोग किया गया एक समान शब्द था, चाहे वे तेंदुआ, सिंह या बाघ हों। इस मायने में वह ‘मृग’ इस शब्द जैसे है, जो सभी प्रकार के कुरंग, हिरण और खुर वाले जंगली प्राणियों के लिए उपयोग किया जाता है। इसलिए, जैसे पुरुष-मृग का अर्थ एक मिथकीय पुरुष है जिसके पैरों पर खुर होते हैं वैसे नरसिंह का अर्थ अध-सिंह न होते हुए अध-बड़ी बिल्ली भी हो सकता है।

लेकिन आजकल लोगों को इस सुझाव से खीज होती है कि सिंह, जो जंगल के सर्वश्रेष्ठ परभक्षी हैं, भारत के मूल निवासी नहीं हैं। मज़े की बात तो यह है कि यूरोप में भी सिंह न रहते हुए वे वहाँ के कई राजसी चिन्हों पर मौजूद हैं।

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